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Sunday, August 23, 2026

सामवेद कथा का षष्ठम दिवस : पूषा और पर्जन्य आदित्य की दिनचर्या पर हुआ विशेष प्रवचन



नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। शास्त्रीनगर में चल रही सामवेद की नवमी कथा के छठे दिन आज वैदिक ज्ञान की पावन धारा प्रवाहित हुई। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी जी की प्रेरणा से अपने निज निवास पर सामवेद के अष्टम प्रपाठक के तृतीयार्धक की कथा का वाचन किया। आज की कथा का सूत्र रहा - "नो विश्वा सौभगान्या वह"


बारह आदित्यों में पूषा और पर्जन्य का वर्णन

आज की कथा में 12 आदित्यों में से दो प्रमुख आदित्य पूषा और पर्जन्य से सम्बद्ध दिनचर्या का विस्तृत वर्णन किया गया। प्रो. लखनपाल ने बताया कि मंत्र संख्या 1500 से 1650 तक पूषा आदित्य और 1650 से 1800 तक पर्जन्य आदित्य का परिचय है। उन्होंने दोनों आदित्यों के गणों - ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, राक्षस और अप्सरा के स्वरूप और कार्यों पर प्रकाश डाला। आज की कथा के अधिष्ठात्री देवता रहे - अग्नि, इन्द्र, उषस्, अश्विनौ और सोम।


गोधूलि बेला और वैदिक मंत्रों का सामूहिक गान

कथा का शुभारंभ डॉ. पूनम ने अञ्जते, व्यञ्जते, समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मध्वाभ्यञ्जते। पशुमप्सु च गृभ्णते मंत्र के सामूहिक गान से किया। इसके पश्चात उन्होंने गोधूलि के नाम, स्वरूप और उसके आध्यात्मिक महत्त्व का मनोहारी चित्रण किया।


अग्नि, सोम और उषा की महिमा

उन्होंने कहा कि ऋषियों के अनुसार तेजस्वी अग्नि को "अग्न आयाहि वीतये" जैसे पुरातन स्तोत्रों से याजकों द्वारा प्रज्ज्वलित किया जाता है। यह अग्नि हमारी ऊर्जा का पतन नहीं होने देती। मित्र के समान इस अग्नि से प्रार्थना है कि वह देवताओं के साथ यज्ञ में प्रतिष्ठित होकर घृत की आहुतियों का पान करे। सोम देव की स्तुति करते हुए कहा कि ऋषिजन प्रार्थना करते हैं - हे सोम! आप अपने पान द्वारा इन्द्र के बल को बढ़ाएं, जिससे वह हमारे शत्रुओं का नाश करें। जैसे आकाश से वृष्टि पृथ्वी पर अन्न प्रदान करती है, वैसे ही आपकी अविरल धाराएं हमें पोषण दें।


उषा - सूर्य पुत्री और दिनचर्या का आधार

डॉ. पूनम ने उषा के मनोहर रूप का वर्णन करते हुए कहा कि सूर्य की पुत्री उषा अंधकार रूपी तमस् को हटाती हुई अवतरित होती है। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि वह अश्विनी कुमारों - दास्र और नासत्य को साथ लेकर आए और अज्ञान रूपी अंधकार शत्रुओं का विनाश करे। उन्होंने बताया कि उषा और रात्रि दोनों बहनें हैं। दोनों का एक ही मार्ग है, जिस पर एक के पीछे दूसरी चलती है। दोनों देवकार्य करते हुए न कभी परस्पर विरोध करती हैं, न कहीं रुकती हैं। उन्होंने दिनचर्या में उषाकाल के महत्त्व और उसमें किए जाने वाले दैनिक कर्तव्यों पर विशेष प्रकाश डाला। इस प्रकार बारह आदित्यों का दिनचर्या के साथ सम्बन्ध स्पष्ट किया गया।


कथा के समापन पर इन मंत्रों का सस्वर पाठ किया गया -

ऊर्जो नपातमा हुवे न्वग्निं पावकशोचिषम् ।
अस्मिन्यज्ञे नः स्वध्वरे वह हविः ।। ३१।।

तं हिन्वन्ति मदच्युतं हरिं नदीषु वाजिनम्। इन्दुमिन्द्राय मत्सरम् पवमानम् ।। ३२।।

अश्व इव चित्रारुषी माता गवामृतावरी ।
सखा भूदश्विनोरुषो विभावरी ।। ३३।।

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