नित्य संदेश
मनो सप्तिका
जीवन एक अनोखी छाया,
सुख दुख ने इसको भरमाया।
सुख की अति से मन उच्छृंखल, दुख की अति में बहे नयन जल।
सुख के अश्रु, दुख के अश्रु, मन बन जाता गहरा दल दल।
इस दल दल की बूंद बूंद में, मृग तृष्णा की मोहक माया।
जीवन एक अनोखी छाया...१.
कुछ तो विधि का काला अंकन, कुछ सुख का स्वर्णिम आलेखन।
कुछ इस तन के सद्य कर्म हैं, मन करता इनका संचालन।
मन से ही तो आबंधित है, हर मानव की कंचन काया।
जीवन एक अनोखी छाया...२.
कुछ सांसें विधि से शासित हैं, शेष सभी मन से प्रेरित हैं।
मन प्रेरित कर्मों का प्रतिफल, विधि लेखे में फिर अंकित है।
यही लेख, भावी सांसों में, विधि बन कर फिर से उग आया।
जीवन एक अनोखी छाया...३.
विधि अंकन मन ही करता है, जीवन में सुख दुख भरता है।
पर दायित्व, दुखों के सारे, विधि के मत्थे पर मढ़ता है?
मन ने ही विधि मेघ रूप धर, सांस सांस में दुख बरसाया।
जीवन एक अनोखी छाया...४.
सुख दुख दोनो मन की रचना, बहुत कठिन है इनसे बचना।
यदि मन को वश में कर लें तो, बदल सकेगी यह संरचना।
आत्म नियंत्रित मन ने ही तो, दुख में भी सुख राग बजाया।
जीवन एक अनोखी छाया...५.
चलें स्वयं को खोज निकालें, ध्वस्त करें, मन के सब जाले।
आत्म तत्व है कहीं प्रनिंद्रित, करें साधना, उसे जगा लें।
यही जागरण, इस जीवन को, शाश्वत् सार्थकता दे पाया।
जीवन एक अनोखी छाया...६.
मन, जीवन का मेरु दण्ड है, यह आत्मा का एक खण्ड है।
आत्म शक्ति से युक्त प्रखर मन, काम क्रोध सबसे प्रचण्ड है।
इस मन ने ही तो अपने तप से, मोक्ष धाम का पथ दिखलाया।
जीवन एक अनोखी छाया...७.
मैं
आत्म बोधक
जीवन


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