Wednesday, July 8, 2026

इश्क़ नहीं, ऐतबार का जनाज़ा —साजिद अली सतरंगी

नित्य संदेश 

आज़ का दौर बहुत ही नाज़ुक चल रहा है सोशल मीडिया हो या अख़बार, तमाम जगह एक ही चीज़ ट्रेंड कर रही है, मंगेतर के जरिए मंगेतर का, क़त्ल, तो कहीं पत्नी के जरिए पति का क़त्ल, यह समाज क्यों क़त्लगाह बनता जा रहा है। ऐसे ही ख़बरें तमाम अख़बारात, की मुख्य ख़बर बन रही है,

"सच आख़िर ये है,

"जब रिश्ते मुहब्बत की बुनियाद पर नहीं, बल्कि लालच की बुनियाद पर तामीर होने लगें, तो घर भी क़त्लगाह बन जाते हैं।"

शहर की फ़िज़ा में उस सुबह अजीब-सी ख़ामोशी थी। हर ज़ुबान पर एक ही ख़बर थी। लोग चौराहों, चाय की दुकानों और गलियों में बस उसी वाक़िए का ज़िक्र कर रहे थे।

"एक और शौहर का क़त्ल..."

यह कोई पहली ख़बर नहीं थी। पिछले कुछ बरसों में ऐसी तमाम वारदातें सामने आई थीं, जहाँ किसी ने दौलत के लिए, किसी ने नाजायज़ ताल्लुक़ात छिपाने के लिए तो किसी ने आज़ादी की ख़ातिर अपने ही हमसफ़र की जान ले ली।

इसी शहर में रहता था "आरिज़"।

सादा-मिज़ाज, मेहनतकश और ख़ुद्दार इंसान। सुबह फ़ज्र से पहले उठना, मेहनत करना और शाम को घर लौटकर अपने बच्चों के साथ बैठना ही उसकी दुनिया थी।

उसकी बीवी "नाज़िया" देखने में बेहद ख़ूबसूरत थी। "आरिज़" उसे अपनी ज़िंदगी का सबसे क़ीमती तोहफ़ा समझता था।

निकाह के वक़्त उसने कहा था...

"मैं तुम्हें कभी तकलीफ़ नहीं दूँगा।"

और सचमुच उसने अपनी ज़िंदगी उसी वादे को निभाने में गुज़ार दी।

वक़्त बदला।

सोशल मीडिया का दौर आया।

मोबाइल हाथों में आया तो दिलों के दरवाज़े ग़ैरों के लिए भी खुलने लगे। अंजान लोग भी एक परिवार सा लगने लगें।

"नाज़िया" घंटों मोबाइल पर रहती।

"आरिज़" पूछता...

"किससे बात कर रही हो?"

"नाज़िया" मुस्कुरा कर कहती...

"बस सहेलियों से।"

"आरिज़" बहुत नेकदिल इंसान था उसने कभी शक नहीं किया।

क्योंकि मुहब्बत शक नहीं करती।

लेकिन जिस घर में भरोसा अंधा हो जाए, वहाँ फ़रेब आसानी से दाख़िल हो जाता है।

धीरे-धीरे "नाज़िया" का रवैया बदलने लगा।

अब उसे "आरिज़" की मौजूदगी बोझ लगने लगी।

उसकी मेहनत, उसका प्यार, उसकी फ़िक्र...

सब उसे मामूली लगने लगा।

उधर सोशल मीडिया पर उसकी जान-पहचान एक ऐसे शख़्स से हुई जिसने बड़े-बड़े ख़्वाब दिखाने शुरू कर दिए।

महँगी गाड़ियाँ...

बड़े होटल...

ऐशो-आराम की ज़िंदगी...

और फिर एक दिन उसने कहा...

"जब तक तुम्हारा शौहर ज़िंदा है, हम कभी एक नहीं हो सकते।"

यही जुमला एक इंसान के ज़मीर का क़त्ल करने के लिए काफ़ी था।

उस रात नाज़िया देर तक जागती रही। उसके दिमाग़ में तमाम तरीके आने लगें।एक तरफ़ वो आदमी था जो उसके लिए अपनी जान देने को तैयार था।

दूसरी तरफ़ वो शौहर था जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी उसकी ख़ुशियों पर क़ुर्बान कर दी।लेकिन जब लालच दिल पर हुकूमत करने लगे तो इंसान रिश्तों का वजूद भूल जाता है।

कुछ ही दिनों बाद "आरिज़" अचानक ग़ायब हो गया।

घर वालों ने तलाश शुरू की।

रिश्तेदारों को फ़ोन किए गए।

पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई गई।

तीन दिन बाद शहर से बाहर एक सुनसान जगह पर उसकी लाश मिली।

जिस्म पर ज़ख़्मों के निशान थे।

चेहरे पर ऐसा सुकून था जैसे आख़िरी वक़्त तक उसे यक़ीन रहा हो कि उसे कोई अपना नुक़सान नहीं पहुँचा सकता।

तफ़्तीश शुरू हुई।

मोबाइल की कॉल डिटेल निकाली गई। सीसीटीवी देखे गए और फिर जो हक़ीक़त सामने आई उसने हर शख़्स को हिला दिया। उस पाक रिश्ते को दागदार कर दिया। इस क़त्ल की साज़िश किसी दुश्मन ने नहीं...

बल्कि उसकी अपनी बीवी ने रची थी।

जिस औरत के नाम पर उसने ज़िंदगी भर कमाया...

जिसके लिए उसने अपनी तमाम ख़्वाहिशें क़ुर्बान कर दीं...

उसी ने उसे मौत के हवाले कर दिया।

अदालत में मुक़द्दमा चला।

सबूत इतने मज़बूत थे कि इंकार की कोई गुंजाइश न रही।

चंद महीनो के बाद फ़ैसला आया।

मगर फ़ैसले से "आरिज़" वापस ना आ सका।

उसकी बूढ़ी माँ दिल में एक उम्मीद लिए रोज़ दरवाज़े की तरफ़ देखती।

उसके बच्चे हर रात दादी माॅं से पूछते...

"अब्बू कब आएँगे?"

इन सवालों का कोई जवाब ना तो दादी माॅं के पास था ना ही किसी अदालत के पास था।

असल सवाल यह नहीं कि क़त्ल किसने किया।

असल सवाल यह है कि इंसान इतना बदल कैसे गया?

आख़िर क्यों रिश्ते अब अमानत नहीं, सौदा बनते जा रहे हैं?

क्यों मोबाइल की चंद "चैटे" बरसों की वफ़ा पर भारी पड़ जाती हैं?

क्यों दौलत, इंसानियत से ज़्यादा क़ीमती हो गई?

हक़ीक़त यह है कि आज सिर्फ़ पतियों का ही नहीं, बल्कि बीवियों, बच्चों, माँ-बाप और पूरे ख़ानदान के भरोसे का भी क़त्ल हो रहा है।

हर दिन कोई न कोई रिश्ता लालच, ग़ुस्से, बेवफ़ाई या नफ़रत की भेंट चढ़ जाता है।

इसलिए ज़रूरी है कि हम अपने बच्चों को सिर्फ़ तालीम नहीं, बल्कि अख़लाक़ भी दें।

उन्हें यह सिखाएँ कि रिश्ते इस्तेमाल करने की चीज़ नहीं, निभाने की ज़िम्मेदारी हैं।

निकाह एक मुक़द्दस अहद है।

अगर किसी रिश्ते में मुहब्बत बाक़ी न रहे, तो शरीअत और क़ानून दोनों अलग होने का रास्ता देते हैं।

लेकिन किसी की जान लेना कभी भी किसी मसले का हल नहीं हो सकता।

आज समाज को यह सोचने की ज़रूरत है कि हम किस तरफ़ जा रहे हैं।

अगर हमने अपने ज़मीर, अपने अख़लाक़ और अपने रिश्तों की हिफ़ाज़त ना की, तो आने वाली नस्लें मुहब्बत की किताबों में सिर्फ़ "वफ़ा" का लफ़्ज़ पढ़ेंगी, उसे जी नहीं पाएँगी।

याद रखिए...

जिस घर में ऐतबार मर जाए, वहाँ ज़िंदगी साँस तो लेती है, मगर जीती नहीं।

और जिस समाज में रिश्तों की हुरमत ख़त्म हो जाए, वहाँ हर नई सुबह किसी नए जनाज़े की ख़बर लेकर आती है।

अल्लाह तआला हमें लालच, बेवफ़ाई, नफ़रत और ज़ुल्म से महफ़ूज़ रखे, हमारे घरों में, हमारे दिलों में मुहब्बत, रहमत और अमानतदारी पैदा फ़रमाए। आमीन।



लेखक- साजिद अली सतरंगी

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