Friday, July 24, 2026

"गुरबत में मुहब्बत बू"—लेखक "साजिद अली सतरंगी" की एक कहानी

नित्य संदेश 

गुरबत में मुहब्बत बू

शहर की रौनक़ अपने शबाब पर थी। ऊँची-ऊँची इमारतें, चमकती सड़कें और रात को जगमगाती रोशनियाँ इस शहर की पहचान थीं। मगर इन्हीं रोशनियों के दरमियाॅं कुछ दिल ऐसे भी थे जो तन्हाई के अँधेरों में जी रहे थे।

ऐसे ही शहर में एक बहुत बड़े कारोबारी "मीर ऐजाज़ ख़ान" का आलीशान बंगला था। करोड़ों की जायदाद, कई फैक्ट्रियाँ और दर्जनों गाड़ियाँ उनके शान-ओ-शौकत की निशानी थीं। उनकी इकलौती बेटी "ज़ैना" हुस्न, तालीम और तहज़ीब का ख़ूबसूरत संगम थी। महँगे कपड़े, बड़ी गाड़ियाँ और हर ख़्वाहिश पूरी होने के बावजूद उसके दिल में एक अजीब-सी खालीपन था। दरअसल "ज़ैना" की वालिदा का बचपन में ही सर से साया उठ हो गया था।वो खुद को अकेला महसूस करने लगी थी। मीर ऐजाज़ ख़ान के घर में काम करने वाली बाई ने उसकी परवरिश की। वह अक्सर अपनी बालकनी में खड़ी होकर यही सोचती,

"क्या दुनिया में हर रिश्ता सिर्फ़ दौलत से बनता है? क्या कोई मुझे मेरे नाम या मेरे घर की वजह से नहीं, बल्कि मुझे देखकर भी चाह सकता है?"

दूसरी तरफ़ उसी शहर की एक छोटी-सी बस्ती में ज़ीशान अपनी बूढ़ी अम्मी के साथ रहता था। उसके वालिद पुलिस अधिकारी थे मगर काफ़ी अरसे पहले इंतिक़ाल हो गया था। ज़ीशान की उम्र बहुत कम थी, ज़ीशान दिन में पढ़ाई करता और शाम को शहर की एक किताबों की दुकान पर काम करता । ग़रीबी उसकी ज़िंदगी का हिस्सा थी, मगर उसकी सबसे बड़ी दौलत उसकी ईमानदारी, अख़लाक़ और ख़ुद्दारी थी।

एक दिन  की बात है "ज़ैना" अपनी सहेलियों के साथ उसी किताब की दुकान पर पहुँची। उसने एक किताब पसंद की और जल्दबाज़ी में अपना पर्स वहीं भूल गई। दुकान बंद करते वक़्त ज़ीशान की नज़र उस पर्स पर पड़ी।

पर्स खोलकर देखा तो उसमें लाखों रुपये, एटीएम कार्ड और कुछ ज़ेवरात थे। उसका दोस्त बोला,

"ज़ीशान! अल्लाह ने तेरी सुन ली। इससे तेरी सारी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी।"

ज़ीशान हल्का मुस्कुराया और बोला,

"हराम की दौलत कभी बरकत नहीं लाती। जो मेरा नहीं है, उस पर मेरा कोई हक़ नहीं।"

पर्स में एक पर्ची थी और उस पर्ची पर "ज़ैना" का एड्रेस लिखा था। अगले ही दिन वह पर्स लेकर डरा सहमा ऊंची-ऊंची हवेलियों के दरमियान लिखें हुए पते पर पहुँच गया। 

"ज़ैना" ने जैसे ही दरवाजा खोला और उसके हाथ में अपना पर्स देखा, तो उसकी आँखों में हैरत भर गई।

"क्या आपने इसमें से कुछ भी नहीं लिया?"

"ज़ीशान" ने मुस्कुराकर जवाब दिया,

"जिस रोज़ इंसान अपनी ईमानदारी बेच देता है, उसी दिन उसकी असली ग़ुरबत शुरू हो जाती है।"

ये अल्फ़ाज़ "ज़ैना" के दिल में उतर गए।

उस दिन के बाद "ज़ैना" किसी न किसी बहाने किताबों की दुकान पर जाने लगी। कभी नई किताब, कभी कोई सवाल, कभी सिर्फ़ एक मुस्कुराहट...

धीरे-धीरे दोनों की बातचीत बढ़ने लगी।

"ज़ैना" ने पहली बार किसी ऐसे इंसान को देखा, जो उसके नाम, उसकी दौलत, या उसकी ख़ूबसूरती, से नहीं बल्कि उसके अख़लाक़ से बात करता था।

एक दिन बारिश हो रही थी।

"ज़ैना" दुकान के बाहर खड़ी थी। "ज़ीशान" ने अपना पुराना-सा छाता उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा,

"आप इसे ले जाइए।"

"ज़ैना" मुस्कुराकर बोली,

"और आप?"

"मैं बारिश का आदी हूँ।"

उस दिन "ज़ैना" को एहसास हुआ कि मुहब्बत महंगे तोहफ़ों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी फ़िक्रों से पैदा होती है।

दिन गुज़रते गए।

"ज़ैना" का दिल अब ज़ीशान के लिए धड़कने लगा।

मगर ''ज़ीशान" हमेशा एक फ़ासला बनाए रखता।

यकायक एक दिन "ज़ैना" ने पूछ ही लिया,

"क्या आप मुझसे दूर-दूर इसलिए रहते हैं क्योंकि मैं अमीर हूँ?"

"ज़ीशान" ने गहरी साँस लेकर कहा,

"मैं आपकी इज़्ज़त करता हूँ मेडम। लेकिन हमारी दुनियाएँ अलग हैं। आपकी ज़िंदगी महलों की है, मेरी झोपड़ी की।"

"ज़ैना" मुस्कुराई।

"दिल की दुनिया में महल और झोपड़ी नहीं होती, सिर्फ़ मुहब्बत होती है।"

उस दिन पहली बार "ज़ीशान" की आँखों में मुहब्बत झलकने लगी।

कुछ ही दिनों में शहर भर में दोनों की दोस्ती की चर्चा होने लगी।

जब "ज़ैना" के वालिद "मीर ऐजाज़ ख़ान"  साहब को इसका पता चला तो उनका ग़ुस्सा आसमान छू गया। क्योंकि उनका शुमार शहर के रसूखदार लोगों में होता था।

उन्होंने सख़्त लहज़े में "ज़ैना" से कहा,

"तुम्हारी शादी किसी करोड़पति से होगी, इस ग़रीब लड़के से हरगिज़ नहीं।"

"ज़ैना" ने बहुत ही अदब से जवाब दिया,

"अब्बू! इंसान की औक़ात उसके बैंक बैलेंस से नहीं, उसके किरदार से होती है।"

लेकिन मीर साहब ने उसकी एक न सुनी।

उन्होंने "ज़ीशान" को अपने बंगले पर बुलवाया।

शानदार ड्रॉइंग रूम में बैठाकर बोले,

"जितने पैसे चाहिए ले लो, मगर मेरी बेटी की ज़िंदगी से दूर हो जाओ।" ज़ीशान भले ही ग़रीब लड़का था, मगर वह एक ईमानदार पुलिस अधिकारी का बेटा था।

"ज़ीशान" ने सिर झुकाकर कहा,

"हुज़ूर, ग़रीब हूँ, मगर अपनी मुहब्बत और ज़मीर का सौदा नहीं कर सकता।"

"मीर" साहब ने ग़ुस्से में कहा,

"तुम मेरी बराबरी नहीं कर सकते।"

"ज़ीशान" ने बड़ी नरमी से जवाब दिया,

"बराबरी दौलत से नहीं, इंसानियत से होती है हुजूर।"

ये बात सुनकर मीर साहब गुस्से से लाल हो गए।

उन्होंने अपने आदमियों से कहा शहर में "ज़ीशान" को कहीं नौकरी न मिले।

कुछ ही दिनों में "ज़ीशान" से दुकान की नौकरी भी छूट गई।

घर में फ़ाक़ों की नौबत आ गई।

मगर उसने कभी "ज़ैना" को अपनी तकलीफ़ का एहसास तलक न होने दिया।

"ज़ैना" को जब ये बात मालूम हुई तो उसकी आँखों से आँसू छलकने लगे।

उसने कहा,,

"अगर मेरी वजह से आपको तकलीफ़ पहुँची है तो मुझे माफ़ कर दीजिए।"

"ज़ीशान" मुस्कुराया,

"मुहब्बत तकलीफ़ नहीं देती, मुहब्बत सब्र सिखाती है।"

उधर "मीर" साहब ने "ज़ैना" की मंगनी शहर के बड़े बिज़नेसमैन के बेटे से तय कर दी।

मंगनी के दिन "ज़ैना" बिल्कुल ख़ामोश थी।

जब अंगूठी पहनाने का वक़्त आया तो उसने सबके सामने कहा,

"मैं निकाह सिर्फ़ उसी से करूँगी जिससे मेरा दिल राज़ी है।"

महफ़िल में सन्नाटा छा गया।

"मीर" साहब की इज़्ज़त दाँव पर लग गई।

उन्होंने ग़ुस्से में "ज़ैना" को घर में क़ैद कर दिया।

उधर "ज़ीशान" ने फ़ैसला किया कि वह शहर छोड़ देगा।

उसे लगा कि उसकी वजह से "ज़ैना" की ज़िंदगी मुश्किल हो रही है।

वह अपनी अम्मी के साथ दूसरे शहर जाने लगा।

बस अड्डे पर पहुँचते ही किसी ने पीछे से आवाज़ दी,

"ज़ीशान!"

उसने पलटकर देखा।

"ज़ैना" हांफती हुई उसके सामने खड़ी थी।

उसकी आँखों में आँसू थे।

"अगर आज आप चले गए तो मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए वीरान हो जाएगी।"

ज़ीशान कुछ देर ख़ामोश रहा।

इतने में पीछे से मीर ऐजाज़ ख़ान, भी आ गए।

उन्होंने देखा कि उनकी बेटी पहली बार किसी के लिए इस क़दर रो रही है।

उसी वक़्त एक बुज़ुर्ग ने "मीर साहब से कहा,

"जनाब, बेटी को महल नहीं, अच्छा हमसफ़र चाहिए। दौलत तो आज है, कल नहीं होगी; मगर अच्छा किरदार उम्र भर साथ देता है।"

"मीर साहब कुछ देर ख़ामोश रहे।

उन्हें याद आया कि शहर में लोग उनकी दौलत की नहीं, बल्कि "ज़ीशान" की ईमानदारी की मिसाल देते हैं।

उन्होंने "ज़ीशान" की तरफ़ देखा और कहा,

"बेटा... मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हें ग़रीबी से तौला, किरदार से नहीं।"

"मीर साहब की यह बात सुनकर"ज़ीशान" की आँखें नम हो गईं।

उसने फ़ौरन कहा,

"आप बड़े हैं। आपकी इज़्ज़त करना मेरा फ़र्ज़ है।"

"मीर साहब ने "ज़ैना" का हाथ "ज़ीशान" के हाथ में रखते हुए कहा,

"आज से तुम सिर्फ़ मेरी बेटी के नहीं, मेरे बेटे भी हो।"

"ज़ैना" की आँखों से ख़ुशी के आँसू बह निकले।

कुछ महीनों बाद सादगी से दोनों का निकाह हुआ।

निकाह में न कोई दिखावा था, न फ़िज़ूल ख़र्ची।

बस दुआएँ थीं, मुहब्बत थी और अपनापन।

निकाह के बाद "मीर साहब ने "ज़ीशान" से कहा,

"मैं चाहता हूँ तुम मेरा कारोबार संभालो।"

"ज़ीशान" ने जवाब दिया,

"मैं मेहनत से अपनी पहचान बनाना चाहता हूँ। अगर आपकी रहनुमाई मिल जाए तो मेरे लिए यही सबसे बड़ी दौलत होगी।"

"मीर साहब मुस्कुरा दिए।

उन्होंने पहली बार महसूस किया कि असली अमीरी पैसे में नहीं, बल्कि किरदार, ईमान और सच्ची मुहब्बत, में होती है।

कुछ साल बाद "ज़ीशान" ने अपनी मेहनत और सच्चाई से अपना कारोबार खड़ा कर लिया।

लोग उससे कारोबार ही नहीं, ज़िंदगी जीने का तरीक़ा भी सीखने लगे।

एक पत्रकार ने उससे पूछा,

"आपकी कामयाबी का राज़ क्या है?"

"ज़ीशान" ने मुस्कुराकर "ज़ैना" की तरफ़ देखा और कहा,

"जिस इंसान के साथ सच्ची मुहब्बत, माँ की दुआ, और अल्लाह पर तवक्कुल हो, उसे मंज़िल तक पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता।"

"ज़ैना" ने मुस्कुराते हुए कहा,

"मैंने एक ग़रीब लड़के से मुहब्बत नहीं की थी, बल्कि एक अमीर दिल वाले इंसान से मुहब्बत की थी।"

महफ़िल तालियों से गूँज उठी।

उस दिन हर किसी ने यही कहा,,

"दौलत से घर बनता है, मगर मुहब्बत, ईमानदारी और अख़लाक़ से, जन्नत जैसा आशियाना बसता है।"



लेखक- साजिद अली सतरंगी

मेरठ (उ.प्र.)


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