नित्य संदेश
पिता का साथ बचपन के बाद...
एक अरसे से चूमा नहीं,
माथा पिता का, बचपन के बाद।
एक अरसे से थामा नहीं,
हाथ पिता का, बचपन के बाद।
एक अरसे से खाई नही,
डांट पिता की, बचपन के बाद।
एक अरसे से देखी नहीं,
मुस्कान पिता की, बचपन के बाद।
एक अरसे से घुमा नहीं,
साथ पिता के, बचपन के बाद।
एक अरसे से बैठा नहीं,
पास पिता के, बचपन के बाद।
एक अरसे से कह पाया नहीं,
अपनी बात पिता को, बचपन के बाद।
एक अरसे से सुनी नहीं,
आवाज पिता की, बचपन के बाद।
एक अरसे से सता रही है अब,
याद पिता की, बचपन के बाद।
एक अरसे से कर रहा हूं मैं,
तलाश पिता की, बचपन के बाद।
रविन्द्र तंवर "सूर्योदय"
बड़वाह (म. प्र.)


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