-लोटस हॉस्पिटल की नकली मोहरों सहित आरोपी जुबैर त्यागी
गिरफ्तार
वसीम अहमद
नित्य संदेश, मेरठ। महिला कांस्टेबल के नाम पर कथित फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट तैयार किए जाने के मामले में पुलिस द्वारा किए गए खुलासे के बाद अब इस प्रकरण ने नया मोड़ ले लिया है। एक ओर सिविल लाइन थाना पुलिस ने फर्जी मेडिकल दस्तावेज तैयार करने वाले कथित गिरोह का पर्दाफाश करते हुए आरोपी जुबैर अहमद को गिरफ्तार किया है, वहीं दूसरी ओर मामले से जुड़ी महिला कांस्टेबल आरिफा ने स्वयं को निर्दोष बताते हुए पूरे घटनाक्रम को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
पुलिस के अनुसार, बीते बुधवार को दरोगा अनिल कुमार की
तहरीर पर सिविल लाइन थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था। जांच में सामने आया कि महिला
कांस्टेबल के नाम से कथित रूप से फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट तैयार कर उसका उपयोग किया
गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में विशेष टीम गठित
कर जांच शुरू की गई। जांच के दौरान मिले साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने किठौर थाना
क्षेत्र के राधना निवासी जुबैर अहमद को गिरफ्तार किया। पुलिस का दावा है कि आरोपी के
कब्जे से एक निजी अस्पताल और चिकित्सक के नाम की कथित फर्जी मोहरें, सादे लेटर पैड
तथा मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं। पुलिस का आरोप है कि इनका इस्तेमाल कर कूटरचित मेडिकल
दस्तावेज तैयार किए जाते थे। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, बरामद मोबाइल फोन और अन्य
दस्तावेजों की जांच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस तरह के फर्जी प्रमाण
पत्र किन-किन लोगों के लिए बनाए गए और इस नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल हैं। पुलिस
यह भी जांच कर रही है कि अस्पताल और चिकित्सक के नाम की मोहरों की प्रतिकृति कैसे तैयार
की गई।
महिला कांस्टेबल ने सुनाई अपनी कहानी
दूसरी ओर, महिला कांस्टेबल आरिफा ने पूरे मामले में खुद
को पीड़ित बताते हुए कहा कि दिसंबर 2024 में थाना किठौर से उनकी ड्यूटी बोट बुक चेकिंग
के लिए वरिष्ठ अधिकारियों के यहां लगाई गई थी। इसी दौरान रास्ते में वह सड़क दुर्घटना
में घायल हो गई। जिसके बाद उनका इलाज चला। आरिफा का आरोप है कि दुर्घटना के बाद उन्हें
विभाग द्वारा गैरहाजिर दर्शा दिया गया और उनकी हाजिरी तथा वेतन संबंधी अभिलेखों में
भी समस्या उत्पन्न हो गई। उनका कहना है कि बाद में वापसी के आदेश होने के बावजूद उन्हें
लंबे समय तक वेतन नहीं मिला और उन्हें निलंबन जैसी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ा।
गढ़ रोड स्थित एक अस्पताल में हुआ इलाज
महिला कांस्टेबल के अनुसार, खराब स्वास्थ्य के चलते उन्होंने
गढ़ रोड स्थित एक निजी अस्पताल में इलाज कराया था। बाद में विभागीय स्तर पर उन्हें
अपने उपचार से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। आरिफा का दावा है कि
उन्होंने इलाज के कागजात जमा किए थे और उन्हें विश्वास दिलाया गया था कि उनकी वेतन
संबंधी समस्या का समाधान हो जाएगा, लेकिन इसके बावजूद उन्हें राहत नहीं मिली। आरिफा
ने कहा कि यदि दस्तावेज फर्जी पाए गए हैं तो इसकी जांच निष्पक्ष रूप से होनी चाहिए
और यह भी देखा जाना चाहिए कि कथित फर्जीवाड़े में उनकी क्या भूमिका है? उनका कहना है
कि उन्होंने स्वयं किसी फर्जी दस्तावेज का निर्माण नहीं कराया और पूरे मामले में उन्हें
बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
कई सवालों के जवाब तलाश रही जांच
इस मामले के सामने आने के बाद कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठ
खड़े हुए हैं। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कथित फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट
किस स्तर पर तैयार किए गए, अस्पताल और चिकित्सक के नाम का इस्तेमाल कैसे हुआ, तथा क्या
इस नेटवर्क में अन्य लोग भी शामिल हैं? पुलिस का कहना है कि मामले की जांच निष्पक्ष
और तथ्यों के आधार पर की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि
फर्जी दस्तावेजों के निर्माण और उपयोग में किन-किन लोगों की भूमिका रही तथा किस स्तर
पर लापरवाही या साजिश हुई। फिलहाल आरोपी जुबैर अहमद को न्यायालय में पेश कर आगे की
कानूनी कार्रवाई की जा रही है, जबकि महिला कांस्टेबल द्वारा लगाए गए आरोपों और उनके
दावों की भी जांच के दायरे में समीक्षा की जा रही है। पुलिस का कहना है कि जांच के
निष्कर्षों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

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