Thursday, June 25, 2026

उर्दू के विकास में दिल्ली कॉलेज की विशिष्ट विशेषताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। : प्रो. ए. आर. फ़तीही

सीसीएस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में “दिल्ली कॉलेज की साहित्यिक सेवाएँ” विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित।

नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। वह मदरसा जो मुगल काल में स्थापित हुआ और धीरे-धीरे मदरसे से कॉलेज में परिवर्तित हो गया। दिल्ली कॉलेज ने ऐसा ज्ञान-संग्रह तैयार किया जिससे उर्दू भाषा को विशेष बढ़ावा मिला। मौलवी ज़काउल्लाह ने अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया। 1857 के विद्रोह के बाद बहुत-सी चीज़ें बिखर गईं, लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं कि दिल्ली कॉलेज की साहित्यिक सेवाओं से हमारे विद्वानों ने बड़ी संख्या में लाभ प्राप्त किया। ये विचार प्रसिद्ध भाषाविद् प्रोफेसर ए. आर. फ़तीही ने उर्दू विभाग और आयुसा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “दिल्ली कॉलेज की साहित्यिक सेवाएँ” विषयक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि उर्दू के विकास में दिल्ली कॉलेज की विशिष्ट विशेषताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद ने पवित्र कुरआन के पाठ से किया। कार्यक्रम का संरक्षण अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त आलोचक डॉ. तकी आबदी (कनाडा) तथा प्रसिद्ध आलोचक, कथाकार एवं उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने किया। अध्यक्षता अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. सगीर अफ़राहीम ने की। मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध भाषाविद् प्रो. ए. आर. फ़तीही (भाषाविज्ञान विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) तथा ‘जहान-ए-उर्दू’, दरभंगा के संपादक प्रो. मुश्ताक अहमद ऑनलाइन उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रसिद्ध आलोचक प्रो. सरवर साजिद (अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) ने भाग लिया। कार्यक्रम में एवोसा की अध्यक्ष प्रो. रेशमा परवीन भी उपस्थित रहीं। शोधार्थी अतहर ख़ान ने शोध-पत्र प्रस्तुत किया। स्वागत भाषण डॉ. इरशाद सियानवी ने दिया, जबकि संचालन लखनऊ विश्वविद्यालय की शाज़िया ख़ान ने किया। धन्यवाद ज्ञापन मोहम्मद आबिद ने प्रस्तुत किया।

उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने विषय का परिचय देते हुए कहा कि मिर्ज़ा ग़ालिब भी दिल्ली कॉलेज में अध्यापन के लिए गए थे, लेकिन उनका स्वागत उस स्तर पर नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था, इसलिए वे वहाँ से लौट आए। मास्टर रामचंद्र, मौलवी ज़काउल्लाह, इमाम बख्श सहबाई, प्यारे लाल आशोब आदि ने उर्दू को अरबी और फ़ारसी के सीमित दायरे से बाहर निकालने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उर्दू साहित्य की सेवाओं में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

प्रो. रेशमा परवीन ने कहा कि लगभग सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में दिल्ली कॉलेज की साहित्यिक सेवाओं को शामिल किया गया है। आज का विषय निश्चित रूप से हमारे शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा।

प्रो. मुश्ताक अहमद ने कहा कि उर्दू जगत के लिए इस कॉलेज का अत्यधिक महत्व है। मुगल काल में इस संस्थान की स्थापना हुई थी। यह केवल साहित्य का केंद्र नहीं था। यूरोप में आधुनिक शिक्षा के आरंभ के समय दिल्ली कॉलेज ने पश्चिमी साहित्य और आधुनिक ज्ञान के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि दिल्ली कॉलेज की स्थापना न हुई होती तो सर सैयद अलीगढ़ में विश्वविद्यालय की नींव नहीं रख पाते। उन्होंने इसी मॉडल पर विश्वविद्यालय की स्थापना की। आज की नई पीढ़ी के लिए यह संस्थान एक आदर्श उदाहरण है।

डॉ. तकी आबदी (कनाडा) ने कहा कि अदबनुमा के कार्यक्रमों में अनेक विषयों पर चर्चा होती है। प्रो. असलम जमशेदपुरी नए-नए विषयों का चयन करते हैं और डॉ. इरशाद साहब सदाबहार व्यक्तित्व हैं, जो विभिन्न विषयों पर सार्थक विचार रखते हैं। रामचंद्र ने अनुवादों के माध्यम से गणित को लोकप्रिय बनाया। इस दृष्टि से उन्हें साहित्य का एक महत्वपूर्ण स्तंभ कहा जा सकता है। हमारी क़ौम की उन्नति शिक्षा से जुड़ी हुई है। दिल्ली कॉलेज ने विज्ञान, उर्दू और गणित की शिक्षा को स्थानीय भाषाओं के माध्यम से आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों तक बंद रहने के बावजूद यह संस्था किसी न किसी रूप में चलती रही और इसके संचालन में साहित्यकारों की सेवाओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। दिल्ली कॉलेज ने वास्तव में दिलों और दिमाग़ों पर शासन किया है।

प्रो. सगीर अफ़राहीम ने कहा कि दिल्ली कॉलेज की महान सेवाओं से कोई इंकार नहीं कर सकता। अंग्रेज़ों ने अपने सिद्धांतों के अनुसार योग्य लोगों का चयन किया। मोहम्मद हुसैन आज़ाद ने अनुवाद के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया। आधुनिक पाठ्यक्रम को विकसित और प्रस्तुत करने में भी दिल्ली कॉलेज की बड़ी भूमिका रही। सर सैयद को जो प्रेरणा और शक्ति मिली, वह दिल्ली कॉलेज से ही मिली और आगे चलकर उन्होंने अलीगढ़ में शैक्षणिक संस्थान की स्थापना की। दिल्ली कॉलेज के शिक्षकों ने केवल पढ़ाने का ही नहीं बल्कि नई पीढ़ी के निर्माण और मार्गदर्शन का भी कार्य किया। सोचने और समझने की नई दिशा हमें दिल्ली कॉलेज से मिली। इसकी शानदार सेवाओं को कभी भुलाया नहीं जा सकता। इस कॉलेज ने मदरसों के लिए भी पाठ्यक्रम तैयार किए। भाषा और भाषाविज्ञान के क्षेत्र में भी दिल्ली कॉलेज ने उत्कृष्ट पाठ्यक्रम विकसित किए। इसकी सेवाएँ असंख्य हैं। विश्वविद्यालय की स्थापना का विचार भी कहीं न कहीं दिल्ली कॉलेज से ही प्रेरित था। इस अवसर पर अतहर ख़ान ने “दिल्ली कॉलेज की सेवाओं पर एक दृष्टि” शीर्षक से अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम में डॉ. आसिफ अली, मोहम्मद शमशाद, फ़रहत अख़्तर तथा अन्य छात्र-छात्राएँ भी जुड़े रहे।

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