नित्य संदेश
प्रकृति चिंतन
हे! खग! मृग हे, मधुकर श्रेणी, तुम देखी सीता मृग नैनी...
और
साँझ भाई दिन आथव्यो चकवी दीनी रोय ।
चल चकवा वा देस में, जहां रैन कदे नहीं होय ।।
पंछी की बात ध्यान आते ही मुझे ये प्रसंग और पंक्तियां बरबस याद आती है और आँखें भाव, उल्लास, और समर्पण भाव से भीग जाती हैं। अब कोई कवि, साहित्यकार, रचनाकार ऐसे कब और क्यों लिखेगा ???
कृत्रिम आधुनिकता बनाम प्राकृतिक आनंद
घरों में अंदर, बाहर कृत्रिम घोंसलों और पंछियों को टांग भले लें, किंतु वह आँखों की चमक, ओठों की मुस्कुराहट, आनंद, कहां से लाएंगे? कहते हैं, बीता वक्त लौट कर नहीं आता, किंतु क्यों नहीं? इसके नायक या खलनायक तो हम ही हैं ना!!!
उम्मीद और सतत प्रयास
कोशिश जारी है...हम सब लगे रहेंगे, अड़े रहेंगे, डटे रहेंगे। उम्मीद पर आकाश टिका है। फिर चिड़िया चहकेगी, बगिया महकेगी, मयूर आँगन-ऑंगन नाचेगा, मैना पुकारेगी, कोयल कुहकेगी। कहते है ना कोशिश करने वालों की जीत निश्चित है।
- शारदा मंडलोई, सिंगापुर


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