नित्य संदेश
उनवान-ए-ग़ज़ल (नए अशआर के साथ)ग़ज़ल का तुम मिरी उनवान बनते जा रहे हो .
मिरी हर साँस का अरमान बनते जा रहे हो ..
लिखूँगा अब मैं अपनी दास्ताँ जिस के सहारे .
कलम की ज़ोर का सुब्हान बनते जा रहे हो ..
मिरी तन्हाइयों को गुफ़्तगू का फ़न मिला है .
ख़यालों का हसीं दीवान बनते जा रहे हो ..
कभी जो राज़ था अब वो इबादत बन गया है .
मिरी आँखों का तुम ईमान बनते जा रहे हो ..
मिरी ख़ामोशियाँ भी अब तुम्हारी मुंतज़िर हैं .
मिरी हर बात का इमकान बनते जा रहे हो ..
मिरे अंदर की वीरानी ज़रा देखो तो आकर .
कहाँ तुम इस क़दर अंजान बनते जा रहे हो ..
लिखूँ क्या और मैं 'वासिफ़' तुम्हारी मदह-ख्वानी .
मिरी सोचों का तुम अरमान बनते जा रहे हो ..
© डॉ. वासिफ़ काज़ी, इंदौर
शाइर एवं व्याख्याता


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