नित्य संदेश
किसी भी राष्ट्र के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिस युवा शक्ति को वह अपनी सबसे बड़ी पूंजी और जनसांख्यिकीय लाभांश कहता है, उसी का भविष्य आज पेपर लीक और शिक्षा माफिया के अंधेरे गलियारों में सरेआम नीलाम हो रहा है। नीट जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय परीक्षा का पेपर लीक होना महज एक प्रशासनिक चूक या तकनीकी खामी नहीं है, बल्कि यह उन लाखों नौनिहालों के सपनों की सामूहिक हत्या है जिन्होंने अपनी आंखों में एक बेहतर भविष्य का सपना सजाया था। सरकार और परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं के लिए शायद यह केवल एक परीक्षा का रद्द होना और नई तारीख का ऐलान करने भर की औपचारिकता हो, लेकिन उन बच्चों से पूछिए जिनके लिए यह परीक्षा महज एक कागज का टुकड़ा नहीं थी। महंगाई और आर्थिक विषमता के इस दौर में, यह परीक्षा गरीबी, अभाव और वर्षों के पारिवारिक संघर्षों से बाहर निकलने का एकमात्र दरवाजा थी, जिसे भ्रष्टाचार की दीमक ने ढहा दिया है।
प्रशासनिक गलियारों से जब एक रूखा सा बयान आता है कि अनियमितता के कारण परीक्षा रद्द की जाती है, तो एक वाक्य में पूरी जिम्मेदारी की इतिश्री कर दी जाती है। पर क्या सत्ता के शीर्ष पर बैठे नीति-निर्धारक उस मानसिक आघात का अंदाजा लगा सकते हैं, जो कोटा या प्रयागराज की तंग गलियों में दस-बाय-दस के कमरों में बंद छात्र झेलता है? वह छात्र जो अपनी किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही अपनों से दूर हो जाता है, घर का स्वाद भूल जाता है और त्योहारों की खुशियों को केवल किताबों के पन्नों में तलाशता है। कोचिंग हब में पढ़ रहे हजारों बच्चों के पीछे केवल उनकी मेहनत नहीं, बल्कि एक पिता का वह कठिन परिश्रम होता है जिसने शायद अपनी पुश्तैनी जमीन गिरवी रखी होती है, या एक मां की वह तपस्या होती है जिसने अपनी दवा के पैसे बचाकर बेटे की भारी-भरकम फीस भरी होती है। जब पेपर लीक की खबर आती है, तो वह केवल एक पर्चा नहीं फटता, बल्कि उस पूरे परिवार की उम्मीदों की रीढ़ टूट जाती है। क्या कोई भी नई तारीख उस मानसिक अवसाद और टूटे हुए भरोसे की भरपाई कर सकती है, जो एक छात्र परीक्षा केंद्र से मुस्कुराते हुए निकलने के बाद घर लौटते समय महसूस करता है?
सवाल यह भी उठता है कि उच्च सुरक्षा और तकनीकी चाक-चौबंद के बड़े-बड़े दावों के बीच राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा का अभेद्य माना जाने वाला तंत्र कैसे भेद दिया जाता है? क्या हमारे देश का शिक्षा माफिया अब सरकारी सुरक्षा तंत्र और खुफिया एजेंसियों से भी अधिक शक्तिशाली और आधुनिक हो चुका है? पेपर की सेटिंग, प्रिंटिंग, परिवहन से लेकर परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने की प्रक्रिया में एक ऐसी दीवार होनी चाहिए थी जिसे हिलाना नामुमकिन हो, लेकिन अगर उसमें बार-बार सेंध लग रही है, तो यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार की जड़ें तंत्र के भीतर बहुत गहरी धंसी हुई हैं। यह केवल एक सूचना का रिसाव नहीं है, बल्कि देश की बौद्धिक सुरक्षा और उसकी योग्यता के आधार पर की जाने वाली सर्जिकल स्ट्राइक है। विडंबना देखिए कि हर कुछ वर्षों में एक बड़ा घोटाला सामने आता है, कुछ दिन टीवी पर सुर्खियां बनती हैं, आक्रोश फूटता है और फिर वही पुरानी स्क्रिप्ट दोहराई जाती है—जांच कमेटियों का गठन, कुछ मोहरों की गिरफ्तारियां और अंत में मामला ठंडे बस्ते में। इसी लचर न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया का लाभ उठाकर माफिया फिर से नए शिकार की तलाश में सक्रिय हो जाते हैं।
अब समय केवल सांत्वना देने या जांच कमेटियों के पीछे छिपने का नहीं है, बल्कि ऐसे कठोर प्रहार करने का है जो एक मिसाल बन सकें। जब तक दोषियों के मन में व्यवस्था का खौफ नहीं होगा, यह सिलसिला कभी नहीं थमेगा। इस अपराध को देशद्रोह की श्रेणी में रखा जाना अनिवार्य है, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश के भविष्य के साथ गद्दारी है। इसमें शामिल हर व्यक्ति, चाहे वह आयोग का बड़ा अधिकारी हो, प्रिंटिंग प्रेस का कर्मचारी हो या सॉल्वर गैंग का सदस्य, उसे ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सबक बने। केवल सजा ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जिस भी शिक्षण संस्थान या कोचिंग सेंटर की संलिप्तता रत्ती भर भी पाई जाए, उसका अस्तित्व पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए। उनकी संपत्तियों को कुर्क कर उसे उन छात्रों के मुआवजे में लगाना चाहिए जिनका समय और पैसा इस व्यवस्था की भेंट चढ़ गया। न्याय में देरी माफियाओं के लिए ऑक्सीजन का काम करती है, इसलिए शिक्षा से जुड़े इन घोटालों के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन समय की मांग है।
एक प्रतिभाशाली बच्चा जब यह देखता है कि उसकी वर्षों की तपस्या और ईमानदारी पर सेटिंग करने वालों का पैसा और रसूख भारी पड़ रहा है, तो उसका लोकतंत्र और पूरी व्यवस्था से विश्वास उठ जाता है। युवाओं का यह सामूहिक मोहभंग देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए किसी भी बाहरी आक्रमण से कहीं ज्यादा घातक है। यह स्थिति मेधावी छात्रों को पलायन या फिर अवसाद के रास्ते पर धकेलती है। दोषी कोई भी हो, उसकी अंतिम जवाबदेही सरकार की है, क्योंकि निष्पक्ष परीक्षा का आयोजन और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का प्राथमिक धर्म है। अब शब्दों के मायाजाल और राजनीतिक बयानबाजी से ऊपर उठकर धरातल पर ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है।
राष्ट्र का भविष्य इस बात पर टिका है कि हम अपनी युवा पीढ़ी को कैसा माहौल दे रहे हैं। यदि आज हमने इस सड़ांध को जड़ से नहीं निकाला, तो कल की मेधा कभी हमें माफ नहीं करेगी। जब व्यवस्था स्वयं भ्रष्टाचार की चादर ओढ़ ले, तो एक आम छात्र की कलम निहत्थी हो जाती है। यह समय सत्ता के लिए आत्ममंथन का है कि वह नोटों की गड्डियों और माफियाओं के गठजोड़ के सामने अपनी रीढ़ को झुकने देगी या फिर उस छात्र की आंखों के पानी को पोछेगी जिसने कड़ी धूप में परीक्षा केंद्र के बाहर खड़े होकर एक सुनहरे कल का सपना देखा था।
अंततः, अब बस न्याय का आश्वासन नहीं चाहिए, बल्कि व्यवस्था के भीतर वह परिवर्तन चाहिए जो यह सुनिश्चित करें कि किसी की मेहनत का सौदा चंद रुपयों में न हो सके। उन अनगिनत आंखों की चमक को बचाने की जिम्मेदारी हमारी है, जो आज इस अंधेरे तंत्र में धुंधली पड़ रही हैं। अब समय आ गया है कि योग्यता के सम्मान को व्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया जाए, ताकि कल जब कोई बच्चा अपनी मेहनत से खुद इबारत लिखे, तो उसे यकीन हो कि उसके भविष्य की चाबी किसी दलाल की जेब में नहीं, बल्कि उसकी अपनी प्रतिभा के हाथों में सुरक्षित है। व्यवस्था की चुप्पी अब अपराध मानी जाएगी, क्योंकि शांत रहना भी इस माफिया तंत्र को ऑक्सीजन देने जैसा ही है। देश का स्वाभिमान अब उन परीक्षा पत्रों की गरिमा में ही सुरक्षित है। सरकार को यह समझना होगा कि कलम की ताकत जब हताशा में बदलती है, तो वह किसी भी सिंहासन की नींव हिलाने का माद्दा रखती है। समाधान अब कल पर नहीं टाला जा सकता, क्योंकि लाखों युवाओं का धैर्य अपनी अंतिम सीमा पर है।
— सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'
नित्य संदेश संपादक, मध्य प्रदेश


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