इकराम चौधरी
नित्य संदेश, मेरठ। आज ही के दिन बाब ए कौम,सोशल रिफॉर्मर,अजीम माहिर ए तालीम और लाखों और करोड़ों लोगों को जिहालत की घटा टॉप वादियों से निकालकर तआलीम के जेवर से आरास्ता करने वाले सर सैयद अहमद खां का 27 मार्च 1898 को अलीगढ़ में इंतेकाल हुआ था।
दुनिया भर में फैले हुए चमनिस्तान ए अलीगढ़ के मतवाले अपने मोहसिन को करोड़ों करोड़ो बार सलाम पेश करते हुए खिराज ए अक़ीदत पेश करते हैं।न जाने अब से सैंकड़ों साल पहले उस बुर्जुग ने ए एम यू की मिट्टी में कौन सा खमीर या कौन सी ख़ुशबू मिलाई थी के जो सर सैयद के चमन मे एक बार चला गया वो जिंदगी भर उसका ग़ुलाम हो गया।जिन लोगों को किसी वजह से अलीगढ़ नसीब नहीं हो सका वो अलीग के अलीगढ़ से वालिहाना तआल्लुक को देख कर अक्सर तनज़ ओ इस्तेजाब से कहा करते हैं के अदारे तो और भी हैं जहां से लोग निकल कर बड़े बड़े ओहदों और बुलंदियों तक पहुंचे हैं फिर अलीगढ़ में ऐसी कौन सी बात है के वहां के ओल्ड ब्वॉयज दुनिया के किसी भी गोसे और किसी भी ओहदे पर पहुंच जाएं वो "सर सारे निगारे नरगिस" अलीगढ़ ही रहते हैं और "पाबस्ता गेसू ए सूमबुल" अलीगढ़ से कभी आज़ाद नहीं हो पाते। अब इन बेचारों को कौन समझाए अलीगढ़ एक अलीगेरीयन के लिए क्या होता है
"अलीगेरीयन के लिए अलीगढ़ एक सायादार पिदर है, आग़ोश ए मादर है, बाज़ु ए बिरादर है,और जज़बात ए खुवाहर है,ये हमारे गुलशन ए हस्ती की बहार, नजर की ठनडक और दिलों का करार है। तशनगाने अलीगढ़ के लिए कतराए आब है।दवा ए दर्द है। शिफा ए मर्ज है। शाना ए माशूक और दीदार ए यार है।ये महबूब के हिज़्र ओ फ़िराक़ और लमहाते इंतजार का अमीन भी है।ये जुल्फों लब और रुख़सार ए यार से अठखेलियो का राजदार भी है।
अलीगढ़ एक नशा है जिस का लुत्फ उसके मैखुवार ही जानते है।दुनिया की सारी जन्नतों में घूम फिर कर वापस अलीगढ़ आओ तो लग ता है किसी वनवास से लौटे हैं।इसको एक बीमारी भी कह सकते हैं। बाहरहाल जिस मोहसिन ए कौम ने तमाम मुख्लफतो के बाजूद नासाजगार हालात में दर दर की ठोकर खा कर चंदा किया,इतनी बार चंदा किया के देने वाले थक गए मगर मांगने वाला नहीं थका। उसको इस एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज को तनावर दरख़्त बनाने के लिए पैरों में घुंघरू तक बांधने पड़े, तवायफों के कोठों तक से चंदा मांगना पड़ा, यहां तक के जूतों को भीख में मांग कर उन्हें ठीक करा कर बेचने के बाद बचे पैसों को कॉलेज के फंड में जमा कराया। एक और जहां तमाम परेशानियों को बर्दाश्त किया वही कुफ्र के फ़तुहात का भी सामना किया।
जामा मस्जिद की तामीर के लिए उन्हें घर के तमाम जेवरात बेचने पड़े।यहां तक के घरेलू सामान भी बेचना पड़ा।मगर फरिश्ता सिफत इंसान की लगन में कोई रुकावट नहीं आई।आखिर 27 मार्च 1898 इस मर्द ए मुजाहिद ने अलीगढ़ ही में लुकमा ए अजल को लब्बैक कह दिया।भले ही सर सैयद आज ज़िंदा नहीं है लेकिन उन की सोच और उनका काम हमेशा जिंदा रहेगा। अपने कायद,मोहसिन और दुनिया भर के लोगों को रोशनी दिखाने वाले सर सैयद की कुर्बानियों को सलाम करते हुए हम बार बार खिराज ए अक़ीदत पेश करते हैं।
' शाम दर शाम जलेंगे तेरी यादों के चराग।
नस्ल दर नस्ल तेरा दर्द नुमाया होगा।।"
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