मेरठ: सर्वाइकल कैंसर अक्सर बिना किसी शोर के शुरू होता है। इसकी शुरुआत बहुत हल्के संकेतों से होती है, जैसे संबंध बनाने के बाद हल्का ब्लीडिंग, असामान्य डिस्चार्ज या हल्का दर्द, जिन्हें कई महिलाएं सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देती हैं। इस बीमारी की खास बात यह है कि यह हमें समय देती है-एक लंबा ऐसा चरण होता है जहां खतरे को पहचाना जा सकता है, समय रहते इलाज किया जा सकता है और इसे कैंसर बनने से रोका जा सकता है। लेकिन समस्या तब होती है जब झिझक, डर या अपनी सेहत को पीछे रखने की आदत के कारण जागरूकता और जांच में देरी हो जाती है।
इस बीमारी की शुरुआत अक्सर एचपीवी यानी ह्यूमन पैपिलोमावायरस से होती है, जो दुनिया में बेहद आम संक्रमण है। कई लोगों को यह बिना किसी लक्षण के होता है और अक्सर शरीर की इम्युनिटी इसे खुद ही खत्म कर देती है। लेकिन जब यह संक्रमण लंबे समय तक बना रहता है, खासकर हाई-रिस्क एचपीवी टाइप्स के साथ, तब यह सर्वाइकल सेल्स में धीरे-धीरे बदलाव लाने लगता है। स्मोकिंग और कमजोर इम्युनिटी इस खतरे को बढ़ा सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण है समय पर स्क्रीनिंग न होना, जिससे ये बदलाव चुपचाप आगे बढ़ते रहते हैं।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के गायनी ऑन्को विभाग की एसोसिएट डायरेक्टर एवं क्लिनिकल लीड डॉ. कनिका बत्रा मोदी ने बताया एचपीवी संक्रमण और कैंसर के बीच एक महत्वपूर्ण प्री-कैंसर स्टेज होती है, जहां सेल्स में बदलाव शुरू हो चुका होता है लेकिन कैंसर नहीं बना होता। यह चरण कई सालों तक रह सकता है और इसी दौरान इलाज सबसे आसान और असरदार होता है। नियमित स्क्रीनिंग जैसे पाप टेस्ट और एचपीवी टेस्ट के जरिए इन बदलावों को समय रहते पहचाना जा सकता है और कैंसर को शुरू होने से पहले ही रोका जा सकता है। अगर इस प्री-कैंसर स्टेज को नजरअंदाज कर दिया जाए या इलाज न किया जाए, तो यही बदलाव धीरे-धीरे कैंसर का रूप ले सकते हैं। इस दौरान शरीर कुछ संकेत देने लगता है, जिन्हें कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, जैसे संबंध के बाद ब्लीडिंग, पीरियड्स के बीच या मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग, बदबूदार या खून मिला डिस्चार्ज, और पेल्विक पेन खासकर संबंध के दौरान। हालांकि ये लक्षण हमेशा कैंसर के नहीं होते, लेकिन सही कारण जानने के लिए डॉक्टर से जांच कराना बेहद जरूरी है।“
एक बड़ी सामाजिक समस्या यह भी है कि एचपीवी और सर्वाइकल कैंसर को लेकर आज भी अनावश्यक झिझक और स्टिग्मा बना हुआ है। यही कारण है कि कई महिलाएं समय पर जांच नहीं करातीं। उन्हें अतिरिक्त टेस्ट का डर होता है, परिवार की चिंता होती है या गायनी जांच को लेकर असहजता महसूस होती है। लेकिन जब तक ये झिझक बनी रहती है, तब तक शरीर में हो रहे बदलाव बिना किसी दर्द या संकेत के आगे बढ़ते रहते हैं और इलाज जटिल होता जाता है।
सर्वाइकल कैंसर से बचाव संभव है और इसके लिए दो सबसे प्रभावी उपाय हैं-एचपीवी वैक्सीनेशन और नियमित स्क्रीनिंग। एचपीवी वैक्सीन किशोरावस्था में लेना सबसे ज्यादा प्रभावी होता है, लेकिन वयस्क महिलाएं भी इसका लाभ ले सकती हैं, चाहे वे शादीशुदा हों या उनके बच्चे हों। वहीं, स्क्रीनिंग एक सरल और कुछ ही मिनटों में होने वाला टेस्ट है, जो कई साल पहले ही जोखिम का पता लगा सकता है। वैक्सीन सुरक्षा देती है और स्क्रीनिंग एक सेफ्टी नेट की तरह काम करती है।
सर्वाइकल कैंसर धीरे-धीरे बढ़ता है और यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है, क्योंकि यह हमें समय देता है। इस समय का सही उपयोग करते हुए जागरूक रहना, नियमित जांच कराना और डॉक्टर से एचपीवी वैक्सीन के बारे में सलाह लेना ही इस बीमारी से बचाव का सबसे मजबूत तरीका है। असली सवाल यह है कि क्या हम इस अवसर का उपयोग अपनी और अपने आसपास की महिलाओं की सेहत के लिए कर रहे हैं या नहीं।

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