नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। बुधवार को सातवें दिन कथाव्यास प्रो. सुधाकराचार्य के आवास पर मयूर विहार में सामवेद की चतुर्थ कथा में त्रिपाठी जी ने बताया कि सामवेद में पांच पर्व हैं- अग्नि पर्व, इन्द्र पर्व, पावमान पर्व, महानामनी आर्चिक और उत्तरार्चिक पर्व।
सोलह पर्वों पर पहुंचकर जीव दूसरी शरीर धारण करता चला जाता है। इन्द्र सबसे तेज चलते हैं वो पूरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा 1/17 सेकण्ड में पूरी कर लेते हैं। सूर्य की किरणों का हम सामना करें जो कि हमारे शरीर की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। हे इन्द्र! हम तुम्हें बार बार नमस्कार करते हैं। तुम पानी बरसाने के लिए बादलों को प्रेरित करते हो। हे वज्री!वज्र धारण करने वाले (बादलों की बिजली को इन्द्र का वज्र कहा जाता है। ) आप ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं। सबकुछ तुम्हारा है उस सबको फैलाओ। इन्द्र की सवारी हाथी है।ऐसे ही आप बादलों पर बैठकर वसु गिराते हो।वो सब वसु तुम्हारा ही तो है।सामवेद के मंत्र में बताया है सुन्दर पंखों वाला चन्द्रमा (इन्द्र) आकाश में दौड़ता है।। व जल में दिखता है।सोने की परिधि वाले बाकी देवता तुम्हें नहीं पकड़ पाते। तुम इतने वेग वाले हो।
हे इन्द्र! समुद्र तुम्हारा पिता है। पवित्र करो, चलो,हम तुम्हें सबकुछ प्रदान करते हैं। आप हमारा नाश नहीं करना बल्कि लाभ प्रदान करना। विश्व में जो कुछ भी है वो सब आप देते हो। हमारे शरीर, मन,बुद्धि व इन्द्रियों के लिए भोग व ज्ञान सबकुछ प्रदान कीजिये। हम आपकी स्तुति करते हैं इन्द्र नित्य युवा हैं वे उम्र ना बढने वाले देवता हैं। आपके सहारे हम चल रहे हैं। आप शतक्रतु हो हमें भी सौ यज्ञ करने वाला बनाओ। ताकि हम भी तुम्हारी तरह इन्द्र बन जायें।
अगली कथा पावमान की होगी।

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