Friday, January 16, 2026

NEET PG 2025: मेरिट पर प्रहार और भारतीय स्वास्थ्य सेवा के भविष्य पर संकट



डॉक्टर अनिल नौसरान 
नित्य संदेश, मेरठ। NEET PG 2025 के अंतर्गत MD, MS और DNB पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए घोषित न्यूनतम अंक—सामान्य वर्ग के लिए 103, OBC के लिए 90 और SC/ST के लिए 800 में से नकारात्मक अंक तक—एक अत्यंत चिंताजनक प्रश्न खड़ा करते हैं:

आख़िर भारतीय चिकित्सा शिक्षा के मानकों को क्या हो रहा है?
ये कट-ऑफ केवल कम नहीं हैं—बल्कि ये देश के सबसे महत्वपूर्ण पेशों में से एक में मेरिट के व्यवस्थित क्षरण को दर्शाते हैं। चिकित्सा कोई सामान्य शैक्षणिक विषय नहीं है। यह मानव जीवन, पीड़ा और अस्तित्व से जुड़ा है। इसमें किया गया कोई भी समझौता सीधे तौर पर देश की जनता के स्वास्थ्य और सुरक्षा को खतरे में डालता है।

इस निर्णय से वास्तव में लाभ किसे हो रहा है?
आइए ईमानदारी से बात करें। इतनी अत्यधिक कम की गई कट-ऑफ का मुख्य लाभ निजी मेडिकल कॉलेजों को होता है, जिनमें से अनेक शक्तिशाली राजनीतिक हितों से जुड़े होते हैं। योग्यता के अभाव में जो सीटें खाली रह जाती हैं, उन्हें ऐसे अभ्यर्थियों से भर दिया जाता है जो मेधा के बजाय उच्च शुल्क देने की क्षमता रखते हैं।

यह शैक्षणिक सुधार नहीं—बल्कि चिकित्सा का व्यवसायीकरण है।

देश के स्वास्थ्य से समझौता
स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा में शैक्षणिक मानकों को गिराने का अर्थ है ऐसे विशेषज्ञ तैयार करना जिनमें पर्याप्त मौलिक ज्ञान और नैदानिक दक्षता का अभाव हो सकता है।

क्या कोई निम्न रैंक प्राप्त छात्र, उच्च रैंक और मेधावी छात्र के समान बौद्धिक स्तर, नैदानिक निर्णय क्षमता और नैतिक जिम्मेदारी निभा सकता है?

उत्तर स्पष्ट है। यह नीति भविष्य में ऐसे विशेषज्ञों की पीढ़ी तैयार करने का जोखिम पैदा करती है जो पूर्णतः सक्षम नहीं होंगे—जिसका सीधा असर रोगी सुरक्षा, जन-विश्वास और राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिणामों पर पड़ेगा।

भारतीय चिकित्सा शिक्षा की वह प्रतिष्ठा, जो दशकों से अनुशासन, मेरिट और उत्कृष्टता पर आधारित रही है, अब व्यवस्थित रूप से कमजोर की जा रही है।

चिकित्सा में योग्यता का कोई विकल्प नहीं हो सकता
सामाजिक न्याय महत्वपूर्ण है, किंतु चिकित्सा ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ योग्यता से समझौता किया जा सके। एक सर्जन, चिकित्सक, पैथोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट या इंटेंसिविस्ट का चयन कौशल, ज्ञान और जिम्मेदारी के आधार पर होना चाहिए—न कि आर्थिक क्षमता या राजनीतिक सुविधा के आधार पर।नस्नातकोत्तर चिकित्सा प्रवेश में मानकों का पतन नहीं होना चाहिए और मेरिट से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। विशेषज्ञता प्राप्त करने का एकमात्र आधार प्रतिभा होना चाहिए।

हमें अधिक कॉलेज नहीं—बेहतर कॉलेज चाहिए
भारत को ऐसे मेडिकल कॉलेजों की तेज़ी से बढ़ती संख्या की आवश्यकता नहीं है जिनमें पर्याप्त अधोसंरचना, योग्य फैकल्टी और शैक्षणिक कठोरता का अभाव हो।

देश को वास्तव में आवश्यकता है:
* मौजूदा संस्थानों को सुदृढ़ करने की
* उच्च-मेधावी फैकल्टी की भर्ती की
* कठोर शैक्षणिक ऑडिट और जवाबदेही की
* लाभ के लिए विस्तार नहीं, बल्कि उत्कृष्टता की ओर वापसी की
ध्यान अब संख्या से गुणवत्ता की ओर जाना चाहिए।

भारतीय स्वास्थ्य सेवा के भविष्य की रक्षा का आह्वान
यह निर्णय अत्यंत आपत्तिजनक है और जन-स्वास्थ्य के हित में इसकी समीक्षा आवश्यक है। स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा को पवित्र, मेरिट-आधारित और बिना किसी समझौते के बनाए रखा जाना चाहिए। यदि आज हमने मानकों को गिरने दिया, तो कल के मरीज इसकी कीमत चुकाएँगे।

आइए हम इसके लिए खड़े हों:
पैसे से ऊपर मेरिट
सुविधा से ऊपर दक्षता
व्यवसायीकरण से ऊपर शिक्षा
राजनीतिक हित से ऊपर जन-स्वास्थ्य

लेखक
नेशनल यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स के संस्थापक है



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