Friday, January 16, 2026

वेग के देवता की उड़ान पर संकुचित राजनीति का पहरा क्यों?


नित्य संदेश। भारत की राजनीति में इन दिनों प्रतीकों की लड़ाई अपने चरम पर है। ताजा विवाद अहमदाबाद के अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव 2026 को लेकर है, जहां पवनपुत्र हनुमान की तस्वीर वाली पतंग उड़ाए जाने पर उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने इसे सनातन धर्म का अपमान करार दिया है। लखनऊ से लेकर कानपुर तक प्रदर्शन किए जा रहे है। जोर-शोर से हनुमान चालीसा का पाठ हुआ और प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा गया। लेकिन यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या यह विरोध वाकई धर्म की रक्षा के लिए है, या यह केवल एक सुनियोजित राजनैतिक प्रोपोगेंडा है?

शास्त्रीय प्रमाण है कि श्री रामभक्त हनुमान जी, माता अंजना और वानर राज केसरी को पवनदेव के आशीर्वाद स्वरूप पुत्र रूप में प्राप्त हुए थे। इसलिए हनुमान जी को सनातन परंपरा में पवनपुत्र और वातज कहा गया है। उनके स्वरूप की महिमा ही उनकी गति और आकाश-गमन में निहित है। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं -
आगें चलइ हनुमंत बिराजा। बिराजत पवनपुत्र सब काजा।।
जब हनुमान जी लंका की ओर बढ़े या जब वे हिमालय से संजीवनी बूटी लेकर लौटे, तो उनका वह अलौकिक दृश्य आकाश मार्ग का ही था। 

अब प्रश्न उठता है कि पतंग, जो स्वयं हवा और आकाश का प्रतीक है, उस पर हनुमान जी का चित्र अंकित होना किसी भी दृष्टि से अपमानजनक नहीं हो सकता, बल्कि उनकी अतुलितबलधामं छवि का उत्सव है। यदि हम इसे अपमान मानेंगे, तो हमें उन लाखों ध्वजाओं (झंडों) पर भी प्रश्न उठाना होगा जो मंदिरों के शिखर पर हवा में लहराती हैं। हनुमान जी की छवि वाले भगवा ध्वज जो हम सनातनी अपने घरों पर लगाते है। वह भी पवनवेग से उड़ती है उन पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है। 

विपक्ष विशेषतः कांग्रेस का यह तर्क कि विदेशी मेहमानों के सामने हनुमान जी को पतंग के रूप में दिखाना गलत है, उनकी संकुचित मानसिकता को ही दर्शाता है। हम क्यों अपनी संस्कृति और आराध्य हनुमान जी को दुनिया को दिखाने में शर्म महसूस करें? इसमें क्या गलत है। हम सनातनी तो अपने वाहनों तक पर उड़ते हनुमान जी की प्लास्टिक मूर्ति लगाते है। असल में, यह भारत की कोमलता, अपने प्रतीकों और सांस्कृतिक गौरव को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करने का एक बढ़िया माध्यम है।

विपक्ष समझने में नाकाम है। वह सनातन श्रद्धा का उपयोग करने के लिए सुविधा की राजनीति कर रहे है। विपक्ष के इस हनुमान प्रेम पर सबसे बड़ा सवाल उनकी विश्वसनीयता को लेकर उठता है। विपक्षी दल जो आज हनुमान चालीसा पढ़कर विरोध जता रहे हैं, उन्होंने अयोध्या में श्री राम लला मंदिर के ऐतिहासिक प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के निमंत्रण को सप्रेम अस्वीकार कर दिया था। हमारी रामायण की चौपाई हैं-
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
जिस राम नाम से भवसागर पार हो जाता है, उस मंदिर के उत्सव से दूरी बनाना और अब हनुमान जी के नाम पर सड़क पर प्रदर्शन करना, जनता को सुविधावादी राजनीति का परिचय देता है। जब राम मंदिर का निमंत्रण ठुकराया गया, तब सनातन परंपरा के अपमान की चिंता क्यों नहीं हुई? यह विरोधाभास पूर्णतः स्पष्ट करता है कि यह विरोध भक्ति से नहीं, बल्कि मोदी-विरोध की कुंठा से प्रेरित है।

यह एक राजनैतिक प्रोपोगेंडा से अधिक कुछ नहीं है। लखनऊ में कांग्रेस मुख्यालय के बाहर हुआ नाटक इसी प्रोपोगेंडा का हिस्सा प्रतीत होता है। जब प्रशासन सुरक्षा कारणों से किसी को रोकता है, तो उसे लोकतंत्र की हत्या बताना और फिर वहीं बैठकर हनुमान चालीसा पढ़ना, केवल कैमरा फुटेज बटोरने की रणनीति है। कानपुर के कालीबाड़ी मंदिर में भी यही दृश्य दोहराया गया।

यहां मुख्य मुद्दा यह है कि विपक्ष अब उन मुद्दों पर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहा है, जो भाजपा की ताकत रहे हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि जनता दिखावटी भक्ति और अटूट आस्था के बीच का अंतर बखूबी समझती है। जनता यहां समझ रही है कि पवनपुत्र भगवान हनुमान वेग के देवता है और विपक्ष को इतना सा नहीं पता। वे बुद्धि और विवेक के देवता भी उनसे सबके लिए बल, बुद्धि, विद्या की कामना हैं। वर्णन है कि 

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

यदि विपक्ष वाकई हनुमान जी का सुमिरन करता है, तो उन्हें उस विवेक की भी प्रार्थना करनी चाहिए जिससे वे समझ सकें कि धर्म को केवल चुनावी लाभ के लिए ढाल बनाना अंततः उन्हीं की साख को नुकसान पहुंचाता है। 

हनुमान जी के प्रतीक रूपी पतंग तो भारतीय तथ्यों की जीत, भ्रम की हार है। अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव एक ऐसा मंच है जहां भारत अपनी विविधता और परंपराओं को उड़ान देता है। वहां हनुमान जी की छवि का होना यह संदेश देता है कि भारत आज भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। विपक्ष द्वारा इसे अपमान कहना न केवल अतार्किक, असंगत है, बल्कि उन करोड़ों भक्तों की भावनाओं का भी अनादर है जो अपने वाहन, घर और ध्वज पर हनुमान जी को गर्व से स्थान देते हैं।
देश की जनता अब जागरूक है। वह जानती है कि कौन राम काज में बाधा डाल रहा था और कौन आज हनुमान जी के नाम पर राजनीति की रोटियां सेंक रहा है। राजनीति में जब आस्था को केवल विरोध का हथियार बनाया जाता है, तो तर्कों की कसौटी पर वह अक्सर कमजोर साबित होती है। अंततः, सत्य और तथ्य ही टिकते हैं, प्रोपोगेंडा की पतंग ज्यादा देर हवा में नहीं रह सकती।

प्रस्तुति
-सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'


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