चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय स्थित उर्दू विभाग में “साहित्य में वसंत” टॉपिक पर ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। अदबनुमा का दो सौवां एपिसोड है। इस मौके के लिए वसंत बहुत अच्छा टॉपिक है। सच में, बसंत में हर जगह प्यार, अपनापन और भक्ति दिखती है। बसंत का मौसम हमें खुश रहने की प्रेरणा देता है। ये शब्द थे कश्मीर यूनिवर्सिटी के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर ज़मान आज़ुर्दा के, जो उर्दू विभाग और आयुसा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “साहित्य में वसंत” टॉपिक पर अपना वक्तव्य दे रहे थे।
उन्होंने आगे कहा कि क़साद और मराठी के साथ-साथ ज़्यादातर उर्दू विधाओं में बसंत का बहुत ज़िक्र होता है। बसंत बच्चों, युवाओं, लड़के-लड़कियों के खेलने का मौसम है। कार्यक्रम की शुरुआत सईद अहमद सहारनपुरी की तिलावत और सुशीला शर्मा की सरस्वती वंदना से हुई। अध्यक्षता प्रोफेसर ज़मान आज़ुर्दा की रही। प्रसिद्ध कवि प्रीतपाल सिंह 'बेताब'(पूर्व आईएएस, जम्मू) मुख्य अतिथि एवं श्री आमिर मेहंदी (बर्मिंघम, इंग्लैंड) ने विशिष्ट अतिथि के रूप में भाग लिया। कवियों में डॉ. पूनम सिंह, (गाजियाबाद), डॉ. दर्शनी प्रिया (दिल्ली), सुशीला शर्मा, (मुज़फ़्फ़रनगर) और लखनऊ से आयुसा की अध्यक्षा प्रोफेसर रेशमा परवीन वक्ता के रूप में मौजूद रहीं। स्वागत डॉ. आसिफ अली और संचालन डॉ. अलका वशिष्ठ ने किया।
आज अदबनुमा के दो सौ एपिसोड पूरे हो रहे हैं। जो हमने एक छोटे से पौधे के तौर पर लगाया था, वह अब एक बड़े पेड़ का रूप ले चुका है। आज का विषय समाज से जुड़ने का काम करता है। बसंत में सब कुछ खिलने लगता है। इसे न सिर्फ हिंदी बल्कि उर्दू अदब में भी बड़ी खूबसूरती और मोहक अंदाज के साथ पेश किया गया है। बसंत में हमारी खुशियां दोगुनी हो जाती हैं। अमीर मेहदी ने आयुसा की टीम का शुक्रिया अदा करते हुए बसंत पर अपना शोधात्मक पेपर पेश किया जिसमें उन्होंने कहा कि बसंत में एक कल्चरल एटीट्यूड देखने को मिलता है। इसका ज़िक्र न सिर्फ उर्दू शायरी में बल्कि उर्दू प्रोज़ में भी अच्छे से मिलता है। उर्दू शायरी ने पीढ़ी दर पीढ़ी बसंत को बड़ी शिद्दत से पेश किया है और बसंत का ताल्लुक सूफी ट्रेडिशन से भी है। यहां अमीर खुसरो में यह बसंती रंग बड़ी ताकत और शोर के साथ मिलता है। एक तरह से यह कहना गलत नहीं होगा कि उर्दू ने बसंत को सभ्यता की निशानी के तौर पर बचाकर रखा है। “सहर अल-बयान” और “गुलज़ार नसीम” में भी बसंत का ज़िक्र बड़ी अहमियत के साथ किया गया है। बसंत उर्दू साहित्य की रगों में दौड़ रहा है। यहां नज़ीर में, बसंत एक साझा सांस्कृतिक अनुभव है जिसमें भारत का हर व्यक्ति दिखता है। बसंत सिर्फ़ एक त्योहार नहीं बल्कि एक मानसिक और बौद्धिक नज़रिया है। बसंत सौंदर्य स्वाद का आईना है। जीवन में बसंत की शक्ति को शामिल करें।
प्रोफेसर रेशमा परवीन ने कहा कि आज मैं अपनी टीम के सभी सदस्यों को बधाई देती हूं और मैं आज सच में बहुत खुश हूं। हमारी टीम ने मेरी पूरी मेहनत से इन कार्यक्रमों को अंजाम दिया है और आज का विषय भी इस संबंध में बहुत महत्वपूर्ण है। बसंत हम सभी पर बहुत असर डालता है। हर जगह एक खूबसूरत माहौल है, बसंत ही बसंत है, खुशियां ही खुशियां हैं। यह वह बसंत है जो दिल के बगीचे को भी खोल देता है। प्रीत पाल सिंह ने कहा कि आज मैं इस कार्यक्रम से जुड़कर बहुत खुश महसूस कर रहा हूं। यहां हम बसंत को बहार भी कहते हैं, जिसका मतलब है फूलों का मौसम और बसंत हमारे भारत की खूबसूरत सभ्यता और संस्कृति का एक हिस्सा है। बच्चों से लेकर बड़ों तक, लोग पतंग उड़ाते हैं। खेतों का हर इंच फूलों से ढका होता है। नज़ीर ने बसंत के बारे में उर्दू में बहुत खूबसूरत कविताएं लिखी हैं।
प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने कहा कि अमीर मेहदी साहब ने इस टॉपिक पर बहुत सुंदर पेपर पेश किया और उन्होंने बसंत और बहार के बीच के थोड़े से अंतर को भी साफ किया। बिना किसी शक के, बसंत प्यार, सभ्यता और संस्कृति का त्योहार है। खानकाह और सोफिया के लिए बसंत की यहां बहुत अहमियत रही है और उन्होंने इसे अपनी शायरी में भी बहुत खूबसूरती से पेश किया है। दक्कन से लेकर अवध तक, उर्दू में बसंत का बहुत ज़िक्र है। कुली कुतुब शाह, नज़ीर अकबर आबादी वगैरह में इसका बहुत ज़िक्र है और बसंत का ज़िक्र सिर्फ उर्दू में ही नहीं बल्कि भारत की दूसरी लोकल भाषाओं में भी बहुत खूबसूरती से किया गया है।
इस मौके पर डॉ. पूनम सिंह, डॉ. दर्शनी प्रिया, डॉ. शादाब अलीम और सुशीला शर्मा ने वसंत से जुड़ी बहुत सुंदर कविताएं पेश कीं। डॉ. आसिफ अली, मुहम्मद ईसा राणा, मुहम्मद जुबैर, शाहे ज़मन, मुहम्मद नदीम, सैयदा मरियम इलाही, मुहम्मद शमशाद और दूसरे स्टूडेंट्स प्रोग्राम से जुड़े थे।

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