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Wednesday, March 25, 2026

भाषा किसी की जागीर नहीं। : प्रोफेसर अब्दुल्ला इम्तियाज



उर्दू विभाग,चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन

नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। आज के स्टूडेंट्स को यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि उर्दू का फिल्मों से बहुत गहरा रिश्ता है। भाषा किसी की जागीर नहीं है। भाषा को कोई भी पढ़ और लिख सकता है। उर्दू भाषा की प्रसिद्धी ने फिल्मों को इज्ज़त दिलाई और यह भाषा लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हुई। कई शायर भी उर्दू में लिखे गानों से काफी पॉपुलर हुए। उर्दू की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अगर लफ़्ज़ समझ में न आए, तो भी यह लोगों को अपनी ओर ज़रूर खींचती है। ये शब्द थे मशहूर विद्वान प्रो. अब्दुल्ला इम्तियाज [अध्यक्ष उर्दू विभाग मुम्बई विश्वविद्यालय] के, जो उर्दू विभाग और इस्माइल नेशनल महिला पीजी कॉलेज, मेरठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार “भारतीय सिनेमा और उर्दू”  में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। 

उन्होंने आगे कहा कि कई गाने और कविताएं सुनने के बाद, लोग उर्दू की ओर रुख कर रहे हैं और यह भाषा नई पीढ़ी के बीच लोकप्रियता हासिल कर रही है। मैं उर्दू विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय का बहुत आभारी हूं कि उन्होंने मुझे इतने महत्वपूर्ण सेमिनार में आमंत्रित किया और वास्तव में इस विभाग ने अपने काम करने के तरीके को बदलकर वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान स्थापित की है। इससे पहले, कार्यक्रम का उद्घाटन एम.ए. उर्दू के छात्र मुहम्मद इकरामुल्लाह ने पवित्र कुरान की तिलावत के साथ किया। मेहमानों को फूल भेंट किए गए और सभी ने मिलकर शमा रोशन की। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. असलम जमशेदपुरी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में प्रोफेसर अब्दुल्ला इम्तियाज, ] और प्रोफेसर अनीता राठी [प्रिंसिपल, इस्माइल नेशनल महिला पीजी कॉलेज, मेरठ] एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रोफेसर रियाज अहमद [शिक्षा विभाग के प्रमुख, मनु, नूह, हरियाणा], प्रोफेसर जमाल अहमद सिद्दीकी [अध्यक्ष लाइब्रेरी साइंस विभाग ] और प्रोफेसर दिनेश कुमार [अध्यक्ष अर्थशास्त्र विभाग ] शामिल हुए। 

स्वागत भाषण डॉ. इफ्फत जकिया ने तथा धन्यवाद डॉ. शादाब अलीम ने दिया और संचालन डॉ. आसिफ अली ने किया। सेमिनार के पहले सत्र में डॉ. फराह नाज ने “शकील बदायुनी की फिल्म सेवाएं” पर , नुजहत अख्तर ने “फिल्म निकाह का विश्लेषणात्मक अध्ययन” पर, अतहर खान ने “फिल्म पर उर्दू संस्कृति का प्रभाव” पर, डॉ. चांदनी अब्बासी ने “उमराव जान: फिल्म और कला” पर अपने पेपर प्रस्तुत किए। प्रोफेसर हुमा मसूद, प्रोफेसर रियाज अहमद, अफाक अहमद खान, भारत भूषण शर्मा ने अध्यक्षीय मंडल में शामिल रहे। डॉ. इरशाद सियानवी ने प्रोग्राम का संचालन किया और डॉ. अलका वशिष्ठ ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया। सेमिनार के तृतीय सेशन का संचालन डॉ अलका वशिष्ठ ने किया। इस सत्र में डॉ. असलम सिद्दीकी ने “फिल्में और उर्दू”, और डॉ. इरशाद सियानवी ने “उर्दू गानों के प्रमोशन में मैगज़ीन “SIP” की भूमिका” पर अपने पेपर पेश किए। अध्यक्षीय मंडल में  प्रो. दीपा त्यागी [अध्यक्षा हिंदी विभाग इस्माइल नेशनल PG कॉलेज, मेरठ], प्रो. अब्दुल्ला इम्तियाज, प्रो. हुमा मसूद, और डॉ. इफ्फत जकिया रहे । इस मौके पर अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो. रियाज अहमद ने कहा कि भारतीय फिल्मों ने भारत की गंगा-जमनी तहजीब को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है। कई फिल्में ऐसी हैं जो सभी पर समान रूप से असर डालती हैं। कई शायरों ने कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद भी फिल्मों के लिए बेहतरीन गाने लिखे हैं। उर्दू डिपार्टमेंट अलग-अलग टॉपिक पर सेमिनार करता रहता है। यह बहुत एक्टिव डिपार्टमेंट है और आज का टॉपिक भी उर्दू और इसके प्रमोशन को लेकर बहुत ज़रूरी है।

प्रोफेसर दिनेश कुमार ने कहा कि आज का टॉपिक अपने आप में एक ज़रूरी और अलग टॉपिक है, इस फील्ड में जिस तरह से अलग-अलग प्रोग्राम किए जा रहे हैं, उसका असर पूरी दुनिया में हो रहा है। आज फिल्मों में बदलाव देखा जा रहा है, जबकि हमारे समय में जो लिटरेचर किताबों में दिखता था, वह सिनेमा में भी दिखता था, लेकिन आज की फिल्मों में लिटरेचर की बहुत कमी है। इंसानियत, भाईचारा और एकता को लेकर जो बातें पहली फिल्मों में दिखती थीं, वे आज नहीं दिखतीं। फिल्में समाज के सभी हिस्सों पर असर डालती हैं। प्रोफेसर जमाल अहमद सिद्दीकी ने कहा कि तीस से चालीस साल पहले की फिल्मों का मकसद समाज को जोड़ना था और फिल्मों में लिटरेचर भी दिखता था, जो अब बहुत कम देखने को मिलता है। पहली फिल्मों के गाने, डायलॉग, किरदार दर्शकों को बहुत इम्प्रेस करते थे। आपसी एकता व सहमति, भाईचारा, इंसानियत, सामाजिक समस्याएं व उनके समाधान भी फिल्मों में पेश किए जाते थे, जबकि आज का दौर बदल गया है तो भाषा, शब्द व गीतों की मिठास सब अपना असर खो चुके हैं। इसी वजह से आज के गीत या डायलॉग कुछ ही समय में अपना असर खो देते हैं, जबकि पचास साल बीत जाने के बावजूद पुराने गीत, किरदार, डायलॉग आज भी लोगों की जुबान पर जिंदा हैं। इसमें कोई शक नहीं कि फिल्मों के प्रचार-प्रसार में उर्दू भाषा ने अहम भूमिका निभाई है। 

प्रोफेसर अनीता राठी ने कहा कि आज की फिल्मों में न तो सभ्यता दिखती है और न ही भाषा में वह आकर्षण है जो अपना स्थायी असर छोड़ सके। पुरानी फिल्मों में साहित्य व सभ्यता थी, कोई भी संगीत, अभिनय या किरदार निर्माण उर्दू के बिना अधूरा है। लोग आज भी पुराने गीतों को बड़े चाव से सुनते व गाते हैं। फिल्मों पर उर्दू साहित्य का असर हमेशा बना रहेगा। ऐसे कार्यक्रम होते रहने चाहिए। ऐसे कार्यक्रमों में छात्रों का भविष्य छिपा है। अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रोफेसर असलम जमशेद पुरी ने कहा कि यह सच है कि करीब तीस से चालीस साल पहले फिल्मों में उर्दू का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता था। आज जो फिल्में आ रही हैं उनमें पुराने गाने, भाषा या कॉलम जैसा कोई स्टाइल नहीं है। पहले हम फिल्मों से भाषा सीखते थे। लेकिन आज की फिल्मों पर भी पॉलिटिक्स हावी हो गई है। कई उर्दू फिक्शन राइटर हैं जिनकी कहानियों और नॉवेल पर फिल्में बनी हैं। आज हिंदुस्तानी का ज़माना है। अब फिल्मों में न तो हिंदी, न उर्दू और न ही इंग्लिश का इस्तेमाल होता है, बल्कि मिली-जुली भाषा का इस्तेमाल हो रहा है। जिससे फिल्म ऑडियंस को कोई खास फायदा नहीं होता और फिल्मों की पॉपुलैरिटी दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। इसके कई कारण हैं, जिन पर भी डिटेल में बात होनी चाहिए। 

कार्यक्रम में डॉ. असलम सिद्दीकी, फरहत अख्तर, मुहम्मद शमशाद, सईद अहमद सहारनपुरी, मुहम्मद नदीम, ईसा राना, सीमा समर, फाबिया, फकीहा, लमरा, तोबा, मुहम्मद तालिब, मेहविश, नायाब, हैदर, जुबैर, आयशा, मुहम्मद शोएब, मुहम्मद आबिद अली, परवेज असलम, तैयबा तबस्सुम, उजमा तरन्नम, कश्श, अरीबा, मरियम नाज, अलवेरा, रजा, निदा खान, शिफा, अजरा, इरम, सबा, मसर्रत, नायाब कुरैशी, मिस्बाह, एलीशा, तोबा गाजी, गजाला, रुखसाना, महक, मुस्कान, रोशनी, अनिमत, शाइस्ता, मदीहा, मंतिशा, नगमा, अनम के साथ ही छात्र-छात्राएं भी उपस्थित रहे। 

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