प्रेमचंद पर दो दिवसीय इंटरनेशनल सेमिनार का उद्घाटन सत्र
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ: मुंशी प्रेमचंद के क्रिटिक बहुत हैं, लेकिन रिसर्चर बहुत कम। प्रेमचंद ने तीन सौ से ज़्यादा कहानियाँ लिखीं, लेकिन उनकी कुछ ही कहानियों पर चर्चा होती है। उन पर कई तरह के आरोप लगाए गए। कभी उन्हें एंटी-ब्राह्मण, कभी एंटी-इस्लाम और एंटी-दलित कहा गया। ये शब्द थे जाने-माने स्कॉलर डॉ. प्रदीप जैन के, जो मेरठ के चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के उर्दू डिपार्टमेंट के प्रेमचंद सेमिनार हॉल में हुए “प्रेमचंद का साहित्य : अतीत, वर्तमान और भविष्य ” विषय पर दो दिवसीय इंटरनेशनल सेमिनार के उद्घाटन सत्र में अपना मुख्य व्याख्यान प्रस्तुत कर रहे थे।
उन्होंने आगे कहा कि आज प्रेमचंद पर रिसर्च की बहुत ज़रूरत है, तभी हम सही मायनों में प्रेमचंद को समझ पाएंगे। उनकी कई रचनाएं आज भी उस दौर की अलग-अलग मैगज़ीन और जर्नल में सुरक्षित हैं, जिन्हें सामने लाने की ज़रूरत है। इससे पहले प्रोग्राम की शुरुआत मुहम्मद फरमान ने पवित्र कुरान की तिलावत से की। बाद में मेहमानों का फूलों से स्वागत किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. असलम जमशेदपुरी ने की। मुख्य अतिथि मशहूर आलोचक और शायर आमिर मेहदी [इंग्लैंड] और विशिष्ट अतिथियों में प्रो. प्रज्ञा पाठक, डॉ. वसी आज़म अंसारी [लखनऊ], डॉ. नफीस अब्दुल हकीम [इलाहाबाद], शहर काजी जैनुल सालिकिन, अफ़ाक अहमद खान आदि रहे। स्वागत भाषण डॉ. शादाब अलीम ने दिया, संचालन डॉ. आसिफ अली ने और धन्यवाद ज्ञापन अफ़ाक अहमद खान ने किया।
इस मौके पर अपने विचार ज़ाहिर करते हुए प्रो. प्रज्ञा पाठक ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद एक ऐसे कहानीकार हैं जिनका महत्व हर दौर में एक जैसा रहेगा। क्योंकि उनकी सभी रचनाओं में, चाहे वह नॉवेल हो या अफ़साना, सामाजिक समस्याओं, इंसानी भावनाओं और विचारों और आज के ज़माने के मुश्किल मुद्दों को आसानी से पाया जा सकता है। उन्होंने प्रेमचंद के मशहूर नॉवेल "रंगभूमि" के एक किरदार सूरदास के बारे में बात की और कहा कि वह कितना महान किरदार है जो हर ज़माने में दबे-कुचले लोगों को मज़बूती देता है। जब तक सूरदास जैसे किरदार रहेंगे, प्रेमचंद को कोई नहीं भूल सकता।
इंग्लैंड से आए मुख्य अतिथि आमिर मेहदी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि बहुत से लोग उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहते हैं, जबकि यह मुसलमानों की भाषा नहीं है। फ़ारक़ गोरखपुरी, बेदी, कृष्ण चंद्र, दया शंकर नसीम और हज़ारों दूसरे लोग हैं जो उर्दू में लिखते रहे हैं। यह सिर्फ़ एक भारतीय भाषा है। आपने जो लिखा है वह कब्र और कफ़न दोनों हो सकता है। इसलिए जो भी लिखा जाए वह सही, सटीक और ईमानदारी से लिखा जाना चाहिए। प्रेमचंद इस सबकॉन्टिनेंट के एक मील के पत्थर हैं जिनके बिना कहानी का इतिहास अधूरा है। प्रेमचंद ने अतीत को पकड़ा और वर्तमान को महसूस किया। उनसे पहले राजकुमारों और परियों की काल्पनिक दुनिया बसी हुई थी, लेकिन प्रेमचंद ने उर्दू कथा साहित्य को वास्तविक रूप दिया। प्रेमचंद ने भूख, प्यास, गरीबी, उत्पीड़न और दुख के माहौल को स्पष्ट रूप से पेश किया। प्रेमचंद पहले कलाकार हैं जिन्होंने समाज को चेतना दी। उन्होंने जीवन की व्याख्या की। प्रेमचंद की कला का वर्तमान से उतना ही गहरा रिश्ता है जितना अतीत से।
शहर काजी जैनुल सालिकिन ने कहा कि हमें शोध करते समय बहुत सावधानी से काम करना चाहिए। क्योंकि हम कई किताबों से उद्धरण लेते हैं और कभी-कभी इन उद्धरणों को अपने शब्दों में लिख लेते हैं। लेकिन जब हम शोध के अंतिम चरण में आते हैं, तो हमारी चोरी इस तरह पकड़ी जाती है कि सभी पृष्ठ पीले दिखते हैं। इसलिए हमें शोध करते समय ईमानदारी से काम करना चाहिए।
अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि एक अच्छी कहानी पाठक को बार-बार पढ़ने के लिए मजबूर भी करती है। मुंशी प्रेमचंद की कई कहानियां हैं जिनमें कलात्मक चपलता और बेहतरीन शैली दिखाई देती है। आज के दौर में प्रेमचंद की कला पर चर्चा करना इसलिए ज़रूरी हो जाता है क्योंकि उन्होंने आज की समस्याओं को बहुत पहले ही, यानी अपने समय में ही, महसूस करके ऐसा साहित्य रचा जिसे हम किसी भी कीमत पर नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
इस मौके पर मौलाना शाह आलम गोरखपुरी, डॉ. अलका वशिष्ठ, डॉ. इरशाद स्यानवी, शहनाज़ परवीन, फरहत अख्तर, उज़मा सहर, मुहम्मद ईसा राणा, मुहम्मद ज़ुबैर, शहर के गणमान्य व्यक्ति और छात्र मौजूद थे।
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